Monday, March 17, 2014

हम सोचते हैं (भाग 8) – होली है!!

लीजिए भई, होली आ गई। जो हमें जानते हैं उन्हें पता है कि यह हमारा सबसे पसंदीदा त्योहार है। बचपन से ही इस त्योहार नें हमें अपने आकर्षणपाश में बाँध रखा है और अभी तक हमारा इससे मोहभंग नही हुआ है। हमारे ज्यादातर मुख्य त्योहार बुराई पर अच्छाई के जीत के प्रतीक हैं और होली कोई अपवाद नही है। जिन बंधुओ के लिए किवदंतियाँ/ मिथक (बहुतों के लिए इतिहास भी) कमजोर कड़ी है उनके लिए बता देते हैं कि होली का नाम होलिका नामक राक्षसी से आया है। जब हम होलिका दहन मनाते हैं तो हम सांकेतिक रूप में होलिका रूपी दुष्टता को जलाते हैं। होली का त्योहार भक्त प्रह्लाद की भक्ति का; उसे बचाने के लिए होलिका के नाश का एवं उसके पिता (और दुष्ट असुर राजा) हिरण्यकश्यप के अत्याचारी शासन के अंत का उत्सव है। पर यह उत्सव रंगों के साथ क्यों खेला जाता है? भगवान राम जब अयोध्या वापस आए तब भी उत्सव मना पर वह प्रकाशोत्सव था रंगोत्सव नही। तो फिर होली पर रंग क्यों?

एक धारणा है कि होली में रंग का समागम भगवान कृष्ण ने किया – राधा एवं अन्य गोपिकाओं के साथ उनका रंगरास होली के रूप में प्रसिद्ध हुआ। दरअसल कृष्ण अपने श्याम रंग से असंतुष्ट थे और इसी हताशा में उन्होनें राधा (एवं अन्य गोपिकाओं) के मुख को रंगा और यहीं से होली में रंग प्रथा की शुरुआत हुई। लोग इसे कृष्ण एवं राधा के प्यार का प्रतीक भी मानते हैं। कृष्ण भगवान थे; महिमामयी थे; अगमजानी थे। उनका रंगो के प्रयोग के पीछे प्रयोजन भाँपे तो होली के समारोह की सच्चाई निकलकर आती है – समानता। अपने रंग से परेशान भगवान ने सारे जग को रंग दिया ताकि कहीं भेद न रहे। कृष्ण रंगो के इस त्योहार से हमें आज भी प्रेम एवं समानता की सीख देते हैं।

यहाँ एक और बात गौर करनेवाली है – अलग अलग कथाएँ एक साथ मिलकर एक पर्व को उसका पूर्ण स्वरूप दे रहीं हैं। जहाँ नाम होलिका की कथा से आया वहीं रीति कृष्णयुग से। आज जब कट्टरता अपना सर फिर उठा रही है तो यह समझना बहुत जरूरी है कि संस्कृति एवं सभ्यता अचल नहीं है बल्कि परिवर्तनशील है जिसमें समय समय पर अनेक दृष्टिकोण समाहित होते हैं। यही कारण है कि जब कोई भारतीय सभ्यता से बीच के 1000 साल निकालने की वकालत करता है तो हम आहत होते हैं।

होली सिर्फ अच्छाई, प्रेम एवं समानता का त्योहार नही है – यह त्योहार है उल्लास का; यह त्योहार है जीवन के सभी रंगो का; यह त्योहार है एक नए ऋतु के आगमन का; यह त्योहार है उम्मीद का, एक नई शुरुआत का। जब हम होलिका दहन करते हैं तो हम अपने मन के विकार को मारने का प्रण लेते हैं, अपनी पुरानी गलतियों को सुधारने का संकल्प लेते हैं। जब हम दूसरों के घर जाकर उनसे मिलते हैं, उन्हें रंग लगाते हैं तो न सिर्फ संबंध प्रगाढ़ करते हैं बल्कि अगर गिले शिकवें हों तो उन्हे भी माफ कर आगे बढ़ते हैं।

होली एक और तरीके से नायाब है – आपने ध्यान दिया होगा कि इस पर्व का किसी अनुष्ठान से कोई लेना देना नही है। न किसी भगवान को पूजना है; न किसी पुजारी को बुलाना; न ही कोई विशेष विधि है कि इसी प्रकार यह त्योहार मनेगा। यह किसी भी प्रकार के आडंबर से मुक्त है। सच कहें तो होली का त्योहार आपको पूर्ण रूप से स्वतंत्र करता है।       

आप कह सकते हैं कि यहाँ लिखी बहुत सारी बातें अब सिर्फ कहने के लिए रह गईं हैं और उनका वास्तव में निर्वाह बहुत कम होता है। इसपर हमारा उत्तर सिर्फ यही है – आज और आगे की होली हमसे और हमारे आचरण से भी परिभाषित होगी। हम इसे जैसा चाहे रूप दे सकते हैं – हमें होली का इस लेख में प्रस्तुत रूप पसंद है और हम कोशिश करेंगे कि हम इसे इसी रूप में प्रचारित करें। आप क्या करेंगे?

P.S:  हमारे एक मित्र दक्षिण कोरिया में कार्यरत हैं और उन्होने अपने फेसबुक पर होली के चित्र लगाएँ हैं। देखकर अच्छा लगा कि उनके कुछ कोरियाई मित्र भी होली के जश्न में शामिल हुए। जहाँ हम अपने देश में ही वैमनस्व का भाव बढ़ा रहें हैं वही होली का त्योहार विदेशी भूमि पर (सांकेतिक तौर पर ही सही) सौहार्द बढ़ा रहा है।


~शानु 

Sunday, March 02, 2014

हम सोचते हैं (भाग 7) – इंद्रधनुष

हाल ही की बात है – हम अपने घनिष्ठ मित्र के विवाह समारोह में सम्मिलित होकर बेंगलुरु (हम अभी भी बैंगलोर कहना ही पसंद करते हैं) से दिल्ली वापस लौटे थे। मध्यरात्रि में जब हमारा विमान दिल्ली की हवाईपट्टी पर उतर गया तो हमने उन शक्स को फोन मिलाया जो हमें नियमित रूप से टैक्सी सेवा प्रदान करते हैं। पता चला कि ड्राइवर से बात न हो पाने के कारण हमारी टैक्सी आ नही पाएगी - अत: हमें अपना इंतजाम इस बार स्वयं ही करना पड़ेगा। यह कोई मुश्किल कार्य नही है और एयरपोर्ट में काफी टैक्सी सेवाएँ उपलब्ध हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वे हमारे जेब पर कुछ ज्यादा ही भारी पड़ती हैं। खैर मध्यरात्रि में और कोई चारा भी नही था सो हमने दिल्ली पुलिस द्वारा उपलब्ध करायी गई टैक्सी सेवा ले ली।

अधिकतर महानगरों में रिक्शे और टैक्सी चालकों की एक महत्वपूर्ण संख्या बिहारियों की होती है – दिल्ली उसमें कोई अपवाद नही है और शायद यहाँ ये प्रतिशत कुछ ज्यादा ही होगा कम नही। हमारे द्वारा किए गए टैक्सी का चालक भी बिहारी था।

कहाँ से हैं आप? हमने पूछा।
जी, बिहार से।
वह तो पता चल गया। बिहार में कहाँ से?
बाँका।
हम पटना से हैं।

हमारे साथ एक प्रॉबलम है – हमें बातें करने में बहुत मजा आता है (इसका असर हमारी लेखनी में भी झलकता है – कुछ लोगों के अनुसार (जोकि काफी हद तक सही है) हम बस लिखते चले जाते हैं)। यही कारण है कि हम जब भी किसी रिक्शा, ऑटो या फिर टैक्सी में बैठते हैं (और जब बैठकर सीधे सोने नही लगते) तो उनके चालकों से बाते करने लगते हैं। यकीन मानिए उन वार्तालापों से बहुत कुछ सीखने, समझने को मिलता है। चर्चा का विषय कुछ भी हो सकता है – मौसम, राजनीति, प्रगति, महत्वाकांक्षा इत्यादि। कभी कभी तो कुछ अपना जीवन तक खोल कर रख देते हैं। पर जब हम बिहारियों से बात करते हैं तो हम उनके क्षेत्र में हुए प्रगति-कार्य के बारे में विशेष रूप से चर्चा करते हैं। अत: हमने पूछ ही लिया – रोड-उड बन गया आपके साईड में?

रोड तो बेहतरीन हो गया है – एकदम मक्खन की तरह।
तो नीतीश काम कर रहें हैं वहाँ पर।

काम तो किए हैं – बिजली भी सुधर गया है। पर एक काम बहुत खराब किए हैं।

क्या?

नीची जाति को बहुत शोखी पर चढ़ा कर रखे हैं।

ऐसा क्या?

हाँ सब मुखिया-वुखिया तक बन रहा है – बताईए जरा।

इसमें क्या प्रॉब्लम है? हमने जानना चाहा।

आपको इसमें प्रॉब्लम नजर नही आ रहा?

नही। वे भी इंसान हैं और सबके जितना उनका भी हक है मुखिया बनने का।

अरे उनको शासन करने का अनुभव नही है न। सब कुछ चौपट कर देंगे।

हमने समझाने का प्रयत्न किया - अब मान लीजिए कि किसी को गाड़ी चलानी नही आती और आप इसमें माहिर हो। आपके अनुसार उस व्यक्ति को गाड़ी नही चलानी चाहिए क्योंकि शुरु में वह आप जितना अच्छा नही चला पाएगा। लेकिन हो सकता है कुछ समय बाद वह आपसे भी अच्छा चलाने लगे।

गाड़ी चलाने और शासन करने में काफी अंतर है।

अरे अभी तो बिहार सुधरना शुरु किया है। अभी रोड आएँ हैं, बिजली आ रही है, बच्चे स्कूल जाना शुरु कर रहें हैं और आप अब फिर से जात पात घुसाने पर जोर दिए हुए हैं। अगर प्रगति होती है तो सभी खुशहाल होंगे सिर्फ एक वर्ग नही। अभी तो आपको अच्छे अस्पताल माँगने चाहिए, रोजगार माँगना चाहिए। जात पात में क्या रखा है।

आप नही समझिएगा।

तो इस बार आप नीतीश को वोट नही देंगे?

पता नही। हम तो उधर जाएँगे जिधर सब जा रहे होंगे।

यह प्रकरण यह बताता है कि बिहारियों के एक वर्ग में असंतोष हैं कि कोई और वर्ग भी आगे बढ़ रहा है। और यह असंतोष नया नही है बस अब कुछ ज्यादा प्रखर हुआ है। अभी करीब एक साल पहले एक रिक्शेवाले ने भी इसी प्रकार की भावनाएँ व्यक्त की थी। वे जनाब दरभंगा के थे। कहने लगे – अब बताईए सर। हम (फलाँ फलाँ जात का) होकर रिक्शा चला रहें हैं और वहाँ नीच लोग अफसर बन रहा है। इ सब काम तो उनलोगो के लिए बना है न, हमारे लिए नही। समय ही उल्टा आ गया है।

आप कह सकते हैं कि ये लोग ज्यादा पढ़े लिखे नही होंगे और शायद इसीलिए ऐसी मानसिकता होगी। पर पढ़े लिखे भी ज्यादा पीछे नही है – एक परिचित ने सीधे न बोलते हुए भी कह ही दिया। 
2004 से पहले का बिहार आज के बिहार से ज्यादा अच्छा था।
हमने पूछा कैसे। भ्रष्टाचार कम था और सामाजिक संतुलन ज्यादा था।

हमने रोड, बिजली, स्कूल इत्यादि में हुए परिवर्तन पर ध्यान आकृष्ट कराया तो बोले – सामाजिक संतुलन ज्यादा जरूरी है। अब यह बताओ कि 500 एकड़ में आई आई टी बनाकर यह क्या कर लेंगे?’ इस कथन के बाद हमारा जिरह करने तक का मन  न हुआ।

जात पात को हम ढ़ंग से कभी समझ ही नही पाए हैं। यह किसी को इतना अंधा कैसे कर देता है कि लोग अपने विकास की तिलांजलि देने को तैयार हो जाते हैं ताकि दूसरों का विकास न हो सके। यह कैसे लोगों को बाध्य कर सकता है कि किससे मिलना है और किससे नही; किससे संबंध बनाने हैं और किससे नही; किसे वोट देना है और किसे नही।

शीर्षक स्वदेस फिल्म के गाने से प्रेरित है:-

समझो सबसे पहले तो,
रंग होते अकेले तो
इंद्रधनुष बनता ही नही।
एक न हम हो पाए तो,
अन्याय से लड़ने को
होगी कोई जनता ही नही।

हम कब समझेंगे कि सबकी प्रगति में ही हमारी भलाई है। हम दूसरों को वंचित रखकर एक सीमित क्षेत्र में ही अपना वर्चस्व स्थापित कर सकते हैं। सच्चाई यह रहेगी कि हम बस कुएँ के मेंढक रह जाएँगे। लेकिन अगर सब मिलकर आगे बढ़ते हैं तो शायद उस सीमित क्षेत्र में हमारा वर्चस्व न हो पर फिर भी हम पहले से कहीं बेहतर होंगे।    

P.S: ऐसा नही है कि बिहार में बदलाव नही हुआ है – हमारे दो निकटतम मित्रों का अंतरजातीय विवाह हुआ है। और ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएँगे आपको। पर शायद यह बदलाव जिस तेजी से होना चाहिए वैसा न हो पा रहा है।

सारे ओपिनियन पोल बता रहें हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जद (यू) की खटिया खड़ी होगी – अगर ऐसा होता है तो इसके बहुत कारण होंगे और एक कारण यह भी होगा कि हम जात को लेकर अपनी मानसिकता में आवश्यकतानुसार बदलाव लाने में अक्षम रहे। 
  

~शानु

Saturday, February 15, 2014

Fear

It is not very often that I get time to ponder upon ‘Life’ and when I do I get stuck at some very basic elements. This might reflect poorly on me but the last time I tried to think about life, I got trapped by something as basic as ‘Emotion’. I realized that I do not even naively understand this simple word and yet I persisted (I have always been headstrong in that way). I was trying to understand what could qualify as the ‘strongest emotion of all’ – the gut said it has to be ‘Happiness’ (but isn’t happiness a state of mind guided by emotions rather than emotion itself?); the heart was rooting for ‘Love’; the mind had read somewhere that it was ‘Hate’ and I was sure that a suppressed part in the brain was advocating for ‘Rage’. Four strong contenders and yet I gravitated towards ‘Fear’.

I think that just like colours, there are some basic emotions which combine to give a wide array of emotions and ‘Fear’ is the most basic of those basic emotions. I consider it to be the trigger – a shadow; a manipulator which remains hidden in the background most of the times and yet stage manage things. Give it a moment to sink in and then think through – isn’t ‘Fear’ the driver for most of (I would like to write ‘all of’ but then sometimes one needs to have moderate viewpoint) our emotions?

There are times when I have rushed to a conclusion and this may be one of those instances but, as of now, I feel that if one has the ability to influence the fear in others (s)he has the ability to control them. Fear obstructs logical thinking; manipulates priorities; guides most of our critical decisions and we seldom realize this brazenly open fact. This is the reason that people who would love to lead us are often tempted to use tactics which invoke the potential ‘fear factor’ amongst us. As stated I may have rushed to a conclusion again but what is the harm in giving this hypothesis a chance to be tested in the real world.

Elections are just round the corner and political parties and individuals would seek our mandate – our permission to be governed; our consent to be controlled. There would be many marketing gimmicks but I think (as in past) fear would emerge as a potent tool. ‘Fear’ of the minority to be under the complete domination of right wing majority fundamentalists; ‘Fear’ of the majority to lose a considerable interest to minority (which to some is also the appeasement of undeserving) in the name of ‘secularism’; ‘Fear’ of downtrodden and backwards to be, yet again, pushed back to the periphery of the development; ‘Fear’ of the higher class (which may sometimes be read as caste) to lose their prominence due to social engineering; ‘Fear’ of the employed to be left behind as the economy slows down; ‘Fear’ of the youngsters not getting their due because of flawed governance; ‘Fear’ of middle class being looted continuously by corrupt babus;‘Fear’ of housewives over rising expenses and what not.

It would be a pity that these fears would determine our future. I know the last sentence has the potential to be a bit controversial – am I suggesting that Inflation, Corruption, Job Creation & Economy should not be a part of our decision on our vote? No, I am not. What I meant was fear should not solely guide our vote – it should be accompanied by logical and rational thinking. But we are but humans. We err – we are naturally designed to give in to fear. We have done it for millennia and we would continue to do so in the future too. The game is on – parties and individuals are and would continue stoking our fears. The ones who manage to manipulate the fears better and in a refined way would hold an edge in the coming elections.

P.S: There are many ways to manipulate fear. I know a few tricks myself:
  1. The fear of unknown – remember the ghost stories?
  2. The fear of known – the famous dialogue by Gabbar Singh proclaiming that kids are kept in discipline by invoking his fear illustrates this form.
  3. The fear invoked by showcasing one’s weakness – ‘You are too weak. You know, you cannot fight this alone.’ type situations


There could be many other tricks in the ‘Fear Management’ course. Watch out and keep me updated if you find those.  

Monday, December 30, 2013

NITH – Reliving the Old Days

I have always maintained that National Institute of Technology Hamipur boasts of one of the most beautiful and serene campuses in the country. I have spent four most wonderful years of my life at that place learning what most believe was ‘Engineering’ but I think I was actually learning much more than mere Operating Systems and Computer Architecture – I think I was learning life. And what an illustrious company I had while doing that – friends and souls who were much better than what I would ever be (I agree there were some with whom I didn’t get along that well but that is long forgotten history); nature which would mostly be in her gentle self, showing the brighter side of the gift called life and a fairly benevolent and able administration ensuring that we have lesser nuisance and better access to basic resources.

‘Which seat?’ a radiant ‘bhadralok’ asked me some 11 and half years back.
‘Computer Science – NIT Hamirpur.’ This simple sentence booked me for four years of unbridled fun in a place which I had not heard of even a month back. On 16th day of August of that eventful year when I put my foot in that campus for the very first time, I was slightly nervous and mostly sad (as I had left my home for the very first time). Four years down the line while I was parting with the college for good, it was leaving the comforts of home again for some uncertain, uncharted journey.

And this journey remains engulfing – It seldom allows you to return to your roots. You tend to fight to regain your way of life but that remains out of reach for most – the best you could do is to reminisce those golden moments with a smile and, if lucky, in the company of a few friends. And that was what I did yesterday.

It all started at the marriage of Rohit. ‘You have to come or else be ready for the repercussions.’ You cannot take this warning lightly especially if you have missed the engagement party too. ‘I would bhai… Tu chinta na kar.’ I had said. Imagine my delight when I saw a score of friends, college mates adorning the baraat party. There were some who were in regular touch; others whom I had met here and there but not regularly and some who were hugging me after 7 long years. It was an emotionally charged evening and we had a ‘helluva’ evening courtesy Rohit’s act of marrying a beautiful lady. It also made us realize that no matter what is the distance and how much time had gone by since we last met, we would always be bounded by that special thread called NITH – the connect will always remain. I wished, ‘We should meet more often’.

It started with this small wish and culminated in a day of fun, frolic and nostalgia with good old NITHian fraternity. It was not an easy task and required herculean efforts from Vikas Jai Arya (a.k.a Vikas Kashyap) to assemble 9 gems of 2002-2006 batch - Vikas, Shashi Bhushan Gupta, Amit Mahajan, Arvind Mishra (a.k.a Tara), Sandeep Yadav (a.k.a Tau), Rohit Kumar (whose marriage started this process), Ram Kishan Kinker (a.k.a Ramu), Vivek Utpal (a.k.a Chunni) and of course me. Rohit and Ramu were gracious enough to bring their wives along.

And those who have studied in a residential engineering college would know what happens when such a group sits after a long time. It was amazing how we could recall those small incidents which otherwise were perceived to be lost in the sands of time. So, someone would bring in the topic of ragging; and the other would interject with his version of a hostel raid; someone would remember the epic ‘ghost stories’ while other would sprinkle the spices of love angles and the ‘ah-so-famous’ CC List; there were stories of individuals and groups; seniors and juniors; teachers and grades; Tilak and Babe ka Dhaba; fights and rivalries and all this with such love and affection that you would not need desserts for a week.

This small get together, for once, took us back to the good old days when you would not be afraid because there would be 240 guys to protect you; you would not mind falling sick because not only your health would be taken care of but also your assignments and projects; you would hop from one room to other just a night before the exams so that you could pass the next day; you would be teased by friends for some boy/ girl without any substantiated evidence and with all imagination; your assignments would be done in assembly line fashion; your room would be acquired by a ‘gang of hooligans’ for watching the cult classic ‘Gunda’ because you had a better speaker; you would be hijacked by your Tamil/ Gulti friends to watch a film in a language of which you did not have any idea at all; you would wake up and go to sleep on the diet of friendly abuses; and you would compete fiercely within but still remain a family at the end of the day.


It would be an understatement to say that we miss NIT Hamirpur. In fact, after yesterday’s meeting, there is a strong desire to visit that place and that too soon. I do not know when that will materialize but it would be great if the batch and the larger NITH fraternity could meet more often. 

Saturday, November 16, 2013

हम सोचते हैं (भाग 6) – अपना अपना इतिहास

हम देख रहें हैं कि आजकल लोगों में इतिहास के प्रति रुझान बढ़ रहा है। एक हमारा समय था कि लगता था कि इतिहास से सिर्फ हमारा और कुछ गिने चुने लोगों का ही लगाव है। हमारा लगाव इस कदर था कि ग्यारहवीं का फार्म भरते तक पिताजी ने छूट दी थी कि आर्टस लें या साईंस (और इसके लिए हम उनके तहेदिल से शुक्रगुजार हैं)। पर हमने विज्ञान को चुना – सोचा इतिहास तो जो बनना था बन गया अब हमारे इतिहास बनाने का समय है। वैसे भी पिताजी हमेशा से चाहते थे (और शायद अभी भी चाहते हैं) कि उनका बेटा इतिहास रचें। इस क्षेत्र में हमें अपना जलवा दिखाना बाकी है पर हाल फिलहाल में जो घटित हो रहा है उससे हम बौखला से गए हैं।

अगर देखा जाए तो बात कुछ भी नही है – एक व्यक्ति विशेष अपने प्रियजनों एवं शुभचिंतकों की अभिलाषाओं को ध्यान में रखते हुए नया इतिहास रचने चला है। हमें अभी तक इतिहास पर उनके वक्तव्यों को सुनने का सौभाग्य तो प्राप्त नही हुआ पर हमने पढ़ा जरूर है। पढ़कर लगा कि उन्होनें असली मुद्दा पकड़ लिया है – इतिहास कभी भी आम वर्ग में प्रचलित इसलिए नही हुआ क्योंकि वह सुरुचिकर नही रहा। अगर लोगों को इतिहास पढ़ाना है तो उसे सुरुचिकर बनाना होगा – उसमें कुछ मसाले डालने होंगे। बस यही कवायद थी लेकिन कुछ संदिग्ध तत्वों ने उसे तिल का ताड़ बना दिया। अब बताइए भला आपको या हमें क्या फर्क पड़ता है कि तक्षशिला बिहार में है या पाकिस्तान में या फिर चंद्रगुप्त मौर्य ने ईसा पूर्व मौर्य काल में राज किया या फिर ईसा के बाद गुप्त काल में? राज तो भारत पर ही किया और मगध से ही किया। इन सब चीजों में मजा बहुत आता है लेकिन – सोचिए बेचारे पाकिस्तान की क्या हालत हुई होगी जब यह विचारक तक्षशिला उनसे लेकर चलते बने। उन्हे डर सता रहा होगा कि कहीं अगले वक्तव्य में हरप्पा और मोहनजोदारो न हाथ से निकल जाए।

इतिहास में रुचि तब और बढ़ती है जब वह निकट काल का हो – इसीलिए इन्होनें शायद पंडित नेहरू और सरदार पटेल का उल्लेख किया होगा। हमें सच में नही पता था कि नेहरू सरदार पटेल की अंतिम यात्रा में शरीक नही हुए थे वर्ना आपको लगता है कि हम बचपन में उन्हें चाचा नेहरू कहकर बुलाते या कभी बाल दिवस मनाते? हमें कभी मौका न मिला कि हम नेहरू या पटेल के करीबी रहें (पैदा ही 80 के दशक में हुए) पर हमें लगता है कि वे दोनों भी ऊपर कहीं कसमसा रहें होंगे कि अब उन्हें लेकर नया इतिहास रचने की कवायद क्यों शुरु हो गई।

अभी इन विशिष्ट इतिहासकार का व्याख्यान कुछ महीनों तक चलता रहेगा और हम सभी उसे पढ़ते/ सुनते रहेंगे। हम आशवस्त हैं कि हमारे ज्ञान में निश्चित बढ़ोतरी होगी – हमारा विशेष ध्यान हालाँकि 2002 के अध्याय और उसके विश्लेषन पर रहेगा जिनके ये एक्सपर्ट/ विशेषज्ञ माने जाते हैं।

अगर आपको लगता है कि बाजार में सिर्फ यही एक इतिहासकार हैं तो आप भूल कर रहें हैं – हालाँकि इतिहास के मामले में वे सभी इनके सामने बस चंगू – मंगू ही है। बस एक है जो कभी कभार कुछ टक्कर दे जाता है। क्योंकि वह एक राजसी परिवार से हैं, वह उस परिवार के इतिहास के विशेषज्ञ तो हैं ही। अभी हाल ही में एक वर्णन में उन्होनें याद दिलाया कि इस देश के ताजा इतिहास का एक अहम एवं अच्छा अंश उनके परिवार ने लिखा है और कैसे उसे रचते रचते उनके पिता एवं दादी को मार डाला गया। वह यह भी बताने से न चूके कि वह भी इतिहास रचने के लिए लालायित हैं चाहे उन्हे भी क्यों न मार दें - मानों इतिहास लिखने वाले को मार देने की रस्म ही हों।

गौर कीजिएगा तो पाईएगा कि सभी अपने अपने हिसाब से इतिहास पढ़ा रहे हैं – कुछ सही, कुछ गलत पर चुनिंदा इतिहास। संपूर्ण और तथ्यप्रधान इतिहास प्रस्तुत करने का न किसी के पास समय है न जरूरत। इन लोगों से प्रेरित होकर सभी अब अपना अपना इतिहास बनाने लग गए हैं।

अभी कुछ ही दिनों पहले हमारे एक प्रिय मित्र ने घोषित किया कि भारत सदैव से ही हिंदू राष्ट्र रहा है।हमसे रुका न गया और हमने पूछ ही लिया पर सिंधु घाटी सभ्यता के लोग तो हिंदू न थे?’

वे भी थे – भूल गए कि वे भी शिव की आराधना करते थे। हमारे जहन में उस काल के मुद्राओं पर अंकित पशुपतिनाथ की छवि आ गई। इतिहास का यह विवेचन हमें काफी रोचक लगा क्योंकि अबतक तो आमतौर पर यही सहमति थी कि आर्य सभ्यता ने अपने कुछ भगवान सिंधु घाटी सभ्यता से भी उठाए होंगे। पर हमें यह कहने का मन नही किया क्योंकि वे जनाब कुछ सुनने के मूड में ही नही थे। इसीलिए हमने यह भी नही पूछा कि जिस धरती से विश्व के चार मुख्य धर्मों का जन्म हुआ – हिंदू/ सनातन, जैन, बौद्ध और सिख (और कितने ही छोटे धर्म और संप्रदाय) उसको एक से बाँधने का तुम्हारा तुक क्या है। और यह भी नही कहा कि भारत के महानतम शासकों में भी अग्रणीय अशोक, कनिष्क एवं अकबर दूसरे धर्म के थे। इसीलिए (और ऐसे अनगिनत तथ्य हैं) हम भारत को सदैव से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की सोच से विस्मित हैं।

अभी कुछ ही दिनों पहले रेलगाड़ी में यात्रा करना था तो हमने समय काटने के लिए कुछ पत्रिकाएँ उठा लीं। एक पत्रिका (हमारे ख्याल से फ्रंटलाइन) में लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार (58 मृत, बिहार 1997) में उच्च न्यायालय के फैसले (जिसमें सारे आरोपियों को बरी कर दिया गया) और उसके बाद के हालात पर लेख था। उसमें एक वाक्य ने हमें झकझोरा – बरी होने के बाद उस विशेष समुदाय के लोग पीड़ित समुदाय के लोगों को धमकी देते रह रहें हैं – हमने हमेशा राज किया है, हम हमेशा राज करेंगे। हमें लगा कि यह भी इतिहास की मिथ्या प्रस्तुति मात्र ही है। लोग हमेशा का अर्थ शायद नही जानते। और अगर यही हमेशा रहा है तो शायद हमें भारतीय सभ्यता पर गौरवांवित होने के बारे में फिर से सोचना पड़ेगा।

इतना लिखने का एक ही मकसद है। आने वाले समय में सभी हमको अपना अपना इतिहास बताएँगे। जैसा कि पहले भी लिखा है उसमें कुछ सच होगा, कुछ झूठ – लोग इस इतिहास का उपयोग अपना अपना लक्ष्य साधने के लिए करेंगे। इतिहास बहुत सशक्त है क्योंकि वह हमें बीते हुए कल से सिखाता है; हमें एक नजरिया देता है। पर आधा अधूरा या झूठा इतिहास उतना ही खतरनाक होता है क्योंकि वह हमारे नजरिए को; हमारी सीख को गलत दिशा देता है। आने वाला समय कठिन है – हमें कई महत्वपूर्ण फैसले लेने हैं। क्या हम मिलकर यह प्रण ले पाएँगे कि उन फैसलों को हम आधे अधूरे या झूठे इतिहास पर आधारित नही करेंगे? - हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि सच्चा इतिहास क्या है।

P.S: आज जब इतिहास के बारे में लिख रहा हूँ तो एक महान खिलाड़ी इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय लिखकर विदाई ले रहा है। हम सभी उसके आभारी हैं और मान सकते हैं कि इतिहास भी जरूर आभारी होगा।  


~शानु

Saturday, October 19, 2013

हम सोचते हैं (भाग 5) – नजरिया (जाखू प्रकरण)

हिमाचल के साथ हमारा रिश्ता पुराना है – हमने अपनी इंजीनियरिंग यहीं से की है। प्राचीन इतिहास और अद्भुत सुंदरता को अपने अंदर समेटे यह धरती मानव (तथा देवों) को सदियों से आकृष्ट करते आई है। जाहिर सी बात है कि हमारा परिवार भी इस देवभूमि को देखने को इच्छुक था। अभी हाल में ही उनकी यह इच्छा पूरी हो गई। हमारे पिता तो एक बार हमारे साथ हिमाचल आए भी थे पर हमारी माँ एवं भाई के लिए यह भूमि नई थी।

जो भी शिमला गए हैं वह इस बात को तो मानेंगे कि अनियंत्रित शहरीकरण के बावजूद इस शहर का अपना एक अलग आकर्षण है। कई रमणीय स्थानों के रहने के बावजूद जो दृष्य आपका स्वत: ही ध्यान खीच लेता है वह है पहाड़ के जंगलों से आपको झांकते हनुमान। 108 फीट ऊँचे हनुमान की यह मूर्ति जाखू पहाड़ी पर स्थित है। मिथको के अनुसार संजीवनी की खोज में निकले हनुमान ने इस पहाड़ी पर उतर जाखू ऋषि से दिशाज्ञान प्राप्त किया था। जाहिर सी बात है कि यह स्थान स्थानीय निवासियों, पर्यटकों एवं श्रधालुयों में समान रूप से प्रसिद्ध है।

यह वाकया जाखू में ही घटा। कुफरी और नालधेरा होते हुए जब हम जाखू पहुँचे तो हमारी गाड़ी के चालक ने कहा – यहाँ बंदरों से सावधान रहिएगा। उनका यहाँ कहर है। जो कोई भी वस्तु छीनी जा सकती है वह उसे छीन लेते हैं। बेहतर होगा की आप अपने जूते, घड़ियाँ, पर्स, चश्में आदि कार में ही रखें।
क्या वे इतने खतरनाक हैं? हमने पूछा।
अरे सर कभी कभी तो आपकी पूरी तलाशी ले लेंगे और आप कुछ न कर पाएँगे। वह मुस्कराया।

परेशानी न मोल लेने की सोच से हमने चालक की लगभग सारी बातें मानी – कुछ अपवाद जरूर रखें। जाखू में उस विशालकाय मूर्ति के अलावा दो मंदिर भी हैं। सो हमने प्रसाद आदि की खरीद के लिए अपना पर्स अपने साथ रखा और हमारे भाई ने अपना चश्मा। उसने सोचा कि भगवान के दरबार में जाने का फायदा ही क्या अगर उनके दर्शन में कठिनाई हो।

आपको यह ज्ञात होने में ज्यादा समय नही लगेगा कि जाखू के बंदर अपनी ख्याति के योग्य हैं। वे उन गिने चुने जीवों की सूची में शामिल किए जा चुके हैं जिन्हे हमने अपनी ख्याति पर पूरी तरह खरा उतरते देखा है। पहले मंदिर जाते समय ही हमें एक समूह मिला जो एक बंदर के हाथ में रखे जूते पाने का भरसक प्रयास कर रहा था। वह एक अद्भुत दृष्य था जो विस्मय और भय का भाव एक साथ ला रहा था। उस समूह को जूता तो मिला पर मंदिर के पुजारी के हस्तक्षेप के बाद। कुछ ही देर में जाखू का एक बंदर हमसे भी टकराया और जब तक हमने अपने हाथ में रखे प्रसाद का आखिरी हिस्सा तक उसे न पकड़ा दिआ उसने हमें अपने गिरफ्त में रखा। हमें अकस्मात लगा कि कहीं इनकी ट्रेनिंग सरकारी बाबुओं ने तो नहीं की। खैर आगे बढ़ते हैं।

हनुमान की मूर्ति और ऊँचाई पर है। वहाँ जाने में हमारा भाई सबसे आगे चल रहा था और हम उसके जरा सा ही पीछे। असंख्य बंदरों से पटे सीढ़ियों पर हम काफी सावधानी से आगे बढ़ रहे थे कि तभी हमारे पास एक हलचल हुई। अचानक एक बंदर थिरका और, इससे पहले कि हम कुछ कह या कर पाते, हमारे भाई के ऊपर झपट्टा लगाते हुए उसके चश्में को अपने कब्जें में कर लिया। यह सब बिजली की गति से घटित हुआ। सामने कि टीले पर अपने हाथ में चश्मा लिए बैठा वह बंदर एकटक हमें देख रहा था मानों माखौल उड़ा रहा हो। हमारा भाई और हम हैरान थे और हताशा और अनुभवहीनता में हमने एक और गलती कर दीं। हमने देखा था कि कैसे पुजारी ने कुछ फेंकने पर बंदर ने वापस जूता फेंक दिया था – हमें बचपन में पढ़ी बंदरों और टोपियों की कहानी याद आ गई। आस पास पत्थरों के अलावा कुछ था नहीं तो हमनें उसी से किस्मत आजमा लीं – परिणाम यह हुआ कि बंदर फुर्र। हजारों की संख्या में उस बंदर को ढूढना असंभव हो गया था। इससे प्रकरण से हमें दो सीख मिली – एक कि अनुभवहीनता में लिए गए फैसले के गलत होने की संभावना ज्यादा होती है और दूसरा कि किताबी ज्ञान और व्यावाहारिक जीवन में फर्क हो सकता है। पर इस वाकये में सीख तो मिलनी ही थी – भगवान के दरबार में जो घटित है।

हम सभी हताश मन से शिखर पर पहुँचे – वह चश्मा भाई का प्रिय था, थोड़ा महंगा था पर सबसे जरूरी बात यह थी कि उसका दृष्टिसखा था। उँचाई पर हमने उस बंदर को खोजने की बहुत कोशिश की पर यह कार्य उतना ही कथिन था जितना कि धान के ढेर में सूई खोजना। एक ही परिस्थिति को झेलते चार लोग अलग-अलग तरीके से सोच रहें थे क्योंकि भूमिका अलग अलग थी। भाई व्यथित था, भगवान से नाराज – वह सोच रहा था कि उसने गलत काम नही किए तो भगवान की सभा में ही नुकसान क्यों हुआ। पापा और माँ को बेटे की चिंता थी तो उन्होनें प्रार्थना की कि माँगना तो बहुत कुछ होगा पर इस बार तो बस बेटे का चश्मा लौटाएँ ताकि उसकी श्रद्धा बनी रहें। और हम सोच रहे थे कि कैसे लौटते ही उसे एक बढ़ियाँ चश्मा दिलाना है।

भगवान की आराधना कर लौटते हुए कुछ और घटा जोकि काफी दिलचस्प है। कुछ लोग ऊपर आते हुए सभी से पूछ रहें थे – क्या आपमें से किसी का चश्मा बंदर लेकर भागा है? हममें आशा कि कुछ किरण जगी – हमारा चश्मा लेकर भागा है। पर क्यों?

नीचे एक बंदर बैठा है हाथ में चश्मा लिए। भाई और हम सरपट नीचे भागे – पहुँचे तो देखा कि वाकई एक बंदर हाथ में एक चश्मा लिए बैठा है और उसके आगे ठीक-ठाक भीड़ जमा है। हमने भाई से पूछा – वो तुम्हारा ही चश्मा है?
देखने में तो वही लग रहा है।
वो हमारा चश्मा है – कैसे मिलेगा? हमने एक दर्शक से पूछा।
पूरा पक्का तो नही है पर उन्हें प्रसाद फेंको तो वे चीजें लौटा देते हैं।

हम सीधे प्रसाद की दुकान पर भागे। उन्हे अपना दुखड़ा सुनाया और प्रसाद तो खरीदा ही, चश्मा वापस लेने में उनकी मदद भी माँगी – हमें इस तरह के लेन-देन के नियम नही पता। हमने सफाई दी।

खैर दुकानदार के प्रसाद फेंकते ही चश्मा उसके हाथ में आ गया। हम सभी की बौंछे खिली ही थी कि आवाज आई – एक्स्क्युज मी!! यह चश्मा मेरा है। हमने देखा तो एक हमारे उम्र का व्यक्ति हमसे चश्मा माँग रहा था। हमने भाई को चश्मा दिखाया तो उसने पुष्टि की कि चश्मा उसका नही है। दोनों चश्में काफी हद तक समान थे अत: उल्लास के क्षण में हम भेद न कर पाए। हमने चश्मा लौटाया और दुखी हो ही रहे थे कि भीड़ से आवाज आई – कहीं वह चश्मा तो आप लोगों का नही है?’ हमने देखा कि मंदिर के द्वार स्तंभ पर एक बंदर एक चश्में को अपनी मुठ्ठी में सहेजे बैठा है।

हमने प्रसाद वाले दुकानदार को देखा तो पाया कि वह उस व्यक्ति से बहस कर रहा था जिसे हमने कुछ देर पहले चश्मा दिया था। कारण जाना तो विस्मित हुए – दुकानदार के अनुसार हमारे द्वारे खरीदे गए प्रसाद के कारण उसका चश्मा मिला था अत: उसे हमें प्रसाद का पैसा लौटाना चाहिए पर वह व्यक्ति इस तथ्य से सहमत नही था। उस दिन एक और सीख मिली – आपके कारण किसी और का कार्य सिद्ध हो सकता है/ उसे श्रेय मिल सकता है और वह व्यक्ति आपके योगदान को पूरी तरीके से अनदेखा कर सकता है। अब या तो आप उस व्यक्ति को/ अपने भाग्य को कोसते हुए वहीं रह सकते हो या फिर अपने कार्य के साथ आगे बढ़ सकते हो। हमने दूसरा मार्ग चुना। दुकानदार को और प्रसाद के पैसे दिए और विनती की कि चश्मा दिला दें। इस बार फिर से प्रसाद फिंका और फिर से चश्मा उसके हाथ में आया। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार चश्मा हमारे भाई का था। आश्चर्य इस बात का था कि इतनी देर अपने पास रखने के बाद भी बंदर ने उस चश्में को ज्यादा नुकसान नही पहुँचाया – बस थोड़े खुरचन के निशान थे। वह बंदर और भी तारीफ के काबिल है क्योंकि उसने नीचे आकर चश्में के मालिक का इंतजार किया – चाहे वह किसी भी लालसा में किया हो।   

यह बहुत ही दिलचस्प वाकया है जो शायद ही हममें से कोई भूलेगा। इस किस्से को मैंने जब भी सुनाया है तो अलग अलग प्रतिक्रियाएँ मिली हैं। कोई इसे भगवान की लीला बोलता है तो कोई चमत्कार तो कोई आशीर्वाद। कोई बंदर की चतुराई की सराहना करता है तो कोई उस सिस्टम की निंदा जहाँ बंदरों को छीनने के लिए प्रेरित किया जाता है।

एक ही कहानी अलग अलग लोगों को अलग अलग तरीके से प्रभावित कर रही है – जब हमने सोचा तो पाया कि उन सभी का इस घटना को देखने का नजरिया अलग है। जीवन के हरेक पहलू के लिए यह सत्य है। लोग उसे अपने नजरिए से देखते हैं – यही कारण है कि जो आपके लिए ठीक है वह शायद मेरे लिए गलत। नजरिया बनता है अनुभव से, ज्ञान से, विचारधारा से, यहाँ तक की सुनी सुनाई बातों से भी। आज देश में नजरिए की लड़ाई है – नजरिए का एक वर्ग जो देश को आगे ले जाना चाहता है और दूसरा जोकि उसे कुछ अलग ही दिशा देना चाहता है। दोनों ही ओर काफी लोग हैं और वे उन सभी चीजों का प्रयोग करेंगे जोकि आपके नजरिए को एक रूप देने में सक्षम हों। अब आपको चुनना है कि आप किस तरफ जाएँगे।  


~शानु