सुबह घर से बाहर निकले तो हवा को बदला हुआ पाया – आज वह मलिन नहीं थी ; न ही दम घोटने को लालायित। हमें आश्चर्य हुआ ; कारण जानने की इच्छा भी हुई। उसे रोक कर पूछा – ‘ ओ बावली , क्या हो गया है तुझे ? आज इतनी निर्मल , इतनी स्वच्छ कैसे है ? आज मुझे परेशान करने का मन नही कर रहा ? ’ इसपर वह मुस्कराई , इठलाई और कहा – ‘ अब से तो मैं ऐसी ही रहूँगी। मसीहा का आदेश है। अच्छे दिन आ गए हैं। ’ इतना बोल वह चलते बनी पर हमें स्तब्ध कर दिया। ‘ अच्छे दिनों ’ की इतने जल्दी आने की उम्मीद हमें कतई नही थी। संशय में तो हम थे पर होंठों पर एकाएक हँसी आ गई। ख्याल में आया कि चलो इस लहर में कुछ तो ठीक हुआ। कॉलोनी में शायद ही कोई हमें पहचानता होगा (सुबह निकलकर देर रात लौटने वाले का सामाजिक अस्तित्व नगण्य होता है) पर हम अनेकों से वाकिफ है। बगलवाली आँटी जो हर रोज सड़क पर कूड़ा फेंकती थी , आज डस्टबीन का प्रयोग करते नजर आईं। हमसे ज्यादा आश्चर्यचकित तो कूड़ावाला था जिसे वे मंद मंद धमकी दे रहीं थी– ‘ अगर आज से इस पूरी कॉलोनी में एक जगह भी कचरा मिला तो तेरी खैर नही। मसीहा के आदेश के उल्लंघन में तुझे पिटवा दूँग...